“एक गरीब”
है तिरस्कृत, है ग्रसित,
निष्कासित सा,
वो समाज का कलंक
एक गरीब, त्रस्त सा।
पूँजीपतियों से दुतकारा
अपने आप सा हारा,
घ्रनित, दूषित, है शोषित
एक गरीब, बेचारा।
ना देखे महल ऊँचे
ना देखे ठाट जीवन के,
रसातल में जी रहा
एक गरीब, कुंठित।
खाने को दाना नहीं,
ना ओढ़न को अँगोछा,
पूस की चाँदनी में
एक गरीब, भूखा, ठिठुरता।
है तम से घिरा हुआ,
दीप आशा का जल रहा,
दूर सभ्यता के मेलों से,
एक गरीब, जी रहा।
ना चढ़ा कभी मोटर पर,
ना करी कभी बैलगाड़ी,
पैदल चलता, ना थकता,
एक गरीब, हठधारी।
मर्म किसी ने ना जाना,
अपनों ने भी ना माना,
एकांत की शरण लिए,
एक गरीब, गम्भीर सा।
उद्वेग लिए निज मन में,
है पूछ रहा संसार से,
दोष क्या उसके जीवन का,
क्यूँ दुःख मिले पुरस्कार में,
यक्षप्रश्न यह बड़ा जटिल,
क्यूँ होता हृदय चोटिल,
कर्म-धर्म से नहीं भ्रमित,
एक गरीब, क्यूँ हतोत्साहित।
ना लालसा दिव्य द्रव्यों की,
ना कामना धन-संपती की,
ना इच्छा अब दिःस्वप्न की,
ना बची लौ जीवन-शक्ति की।
कर रहा संघर्ष निरंतर,
ना मिला कोई प्रत्युतर,
आस जगाए बैठा अब भी,
एक गरीब, है जीवित अब भी।


