जिंदगी के मेले में हमने क्या नहीं पाया है
अपनो को छोड़ो दूसरों को भी पाया है

मां के हाथों से रोटी तो कभी थप्पड़ पाया है
दुल मिट्टी से मिलना पापाजी ने सिखाया है

लोगों लफ्जो से कैसे जख्म दें यही दे पाया है
अपने बाबाजी से तो फिर संस्कार पाया है

कवि LB भाई से क्रोध मुक्त होना सीख पाया है
जिंदगी के मेले में अपने पराए ने भी ठुकराया है

✍️कवि LB यादव?