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गीले शिकवे...!


गिले-शिकवे कब नहीं थे,बीच मेरे तुम्हारे।

इस बार सारे फैसलेगलत निकले हमारे।

फासले बढ़ते गएदरमियाँ मेरे तुम्हारे।

घर उजाड़ दियाकुछ गलतफहमियों ने हमारे।

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