समझ नहीं आ रहा क्या गलत और क्या सही है,
कामयाबी के कोई निश्चित मायने नहीं है,
कोई आज भी वहीं है तो गांव छोड़ने वाले भी कहीं है।
मानते है शहर में बेहतर जिंदगी बेशक रही है,
फिर भी कहीं ना कहीं मन में एक कसक रही है,
मुझे तो यह बात भी बहुत खल रही है कि मेरे खेत की फसल मेरे बिना पक रही है।
-Marmat


