मनुष्य रहते मोह का त्याग ,कहाँ हो पाताअंत काल में भी मोह ,मोक्ष का सतातापर इस परममोक्ष के मोह से भी भारीकलयुग में कुर्सी का मोहसबको निगलता जातासबको निगलता जाता
मनुष्य रहते मोह का त्याग ,कहाँ हो पाता
अंत काल में भी मोह ,मोक्ष का सताता
पर इस परममोक्ष के मोह से भी भारीकलयुग में कुर्सी का मोह
सबको निगलता जातासबको निगलता जाता