तुम्हारे_जाने_के_बाद.. 


मेरे भीतर

बहुत भीतर

अब भी कोई रहता है

तुम्हारे जाने के बाद!


जब भी तिलमिलाहट होती है

बेचैनी बढ़ जाती है

मेरे क़दम ख़ुद-व-ख़ुद

चल पड़ते हैं उसी तरफ़

जहां तुम मिले थे

पहली दफ़ा

मेरे पहले प्यार की तरह!


तुम्हारे जाने के बाद

मैंने हर दिन उसे तलाशा

हर दिन उसे नया पाया

नया रंग, नया रूप

वो रमता गया मुझमें

मैं! मिटता गया उसमें

तुम्हारे जाने के बाद!


तुम्हारे लिए जो

चंद क़िताब के पन्नें

और मामूली सी कहानी है!

मेरी वही जिंदगानी

मेरा पहला प्यार!!

उसी से हुई थी

हम की अनुभूति

आज भी मैं वहीं हूं

जहां वो है

तुम्हारे जाने के बाद


हमारा पता....

वही पुरानी लाइब्रेरी

4/ बटा एक सौ चार।।




 ~ श्रीकांत पांडेय