सुनो...
तुम लौट आओ,
बस इतना ही कहूँगा,
हमारा मिलना तय हुआ था,
बिछड़ना नहीं,
फिर क्यों..? बिना मिले,
बिछड़ने की ज़िद लिए बैठे हो,
मेरे भीतर इतने ख़ामोश तुम!
तुम्हें मालूम है कि पत्ते भी बिछड़ते हैं
पेड़ से एक वक़्त के लिए,
और लौट भी आते हैं वक़्त पर,
पेड़ उन्हें बुलाने या मनाने नहीं जाता,
बैठा रहता है इंतज़ार में,
अपनी ख़ामोशी को दबाये,
वर्षों, महीनों तक यूँ ही
किसी बरसात के आने पर
भीग जाने के लिए,
तुम्हारे जाने से आज भी,
वीरान है सब कुछ,
तो लौट आओ ना....
बस इतना कहूँगा,
हमारा मिलना तय हुआ था,
बिछड़ना नहीं,
फिर क्यों खलती है, तुम्हारी कमी
क्यों रहती है आंखों में नमी?
क्यों देती है दस्तक तुम्हारी यादें,
मेरे दरवाज़े और दरीचों पे,
आकर बैठ जाती हैं, लेट जाती हैं,
मेरे कंधे पे अपना सर रखकर सोने,
आंखे खोलता हूं तो ख़ुद पाता हूं,
फिर अंधेरे से घिरे कमरे में,
घड़ी की टिकटिक के बीच,
अकेला, असहाय, निरुत्तर,
भरा होता हूँ अंदर से बाहर तक,
छलक जाने के लिए,
बिखर जाने के लिए,
मैं कलम उठाता हूं
कि आज लिख दूँ तुम्हें,
तुम लौट आओ,
उंगलिया कांपती है,
पर लिख नहीं पाता हूं,
और रह जाते हैं पन्ने भी वीरान,
मेरी तरह, कुछ न लिख पाने की,
झुंझलाहट से जूझता, चीख़ता सन्नाटा,
और कभी ना टूटने वाला इंतज़ार....
इंतज़ार और इंतज़ार.......
~ Shrikant Pandey
(Lafzon Se Pare...)


