तुम कहते गए सुनो ...

मैं सुनती रही प्रेम 

की लय .....

तुम कहते गए सुनो..

मैं सुनती रही संगीत 

की लय ....

तुम कहते गए सुनो ..

मैं सुनती रही मंदिर

की घण्टियों सा स्वर

तुम कहते गए सुनो ...

मैं सुनती रही भँवरों की

गुंजार .......

तुम कहते गए सुनो ..

मैं बहती नदी को

कल कल सागर की

ओर जाते जाते सुनती

रही ......

तुम कहते गए सुनो ..

मैं धरतीं को बारिश की

बूंदों से भीगते हुए ..

मेघ को बरसते हुए ..

चाँद को आसमान में

आते हुए ..चाँदनी छिटकाते

हुए ...पक्षियों को गाते हुए 

सुनती गई ........

क्योंकि सुनना है चेतना

सुनना है ध्वनि की सार्थकता

सुनना है सृष्टि का सत्य 

सुनना है एक कला !

हर कोई सुनने की कला का 

पारखी हो जाए !

तो इस संसार की कई

समस्याएँ ही सुलझ जाएँ !!

©®कुसुम लखेड़ा