पतझड़ में सूखे पत्ते !
जैसे ही झड़ने लगे !!
वह भी ठिठकी ..
वह भी सोचने लगी !
एक दिन यूँ ही
अपनी काया ..
अपना साया ..
छोड़ कर झड़ जाना है
ये संसार तो बस एक
सरायखाना है !!
©®कुसुम लखेड़ा


पतझड़ में सूखे पत्ते !
जैसे ही झड़ने लगे !!
वह भी ठिठकी ..
वह भी सोचने लगी !
एक दिन यूँ ही
अपनी काया ..
अपना साया ..
छोड़ कर झड़ जाना है
ये संसार तो बस एक
सरायखाना है !!
©®कुसुम लखेड़ा