हमहीं को मार के हमसे बोलें,
औरों के लिए मरना सीखो!
बेइज्ज़त करके कहें हमारी,
इज़्ज़त करना सीखो!!
हर मुसलमां को आतंकी समझो,
हर मर्द को ज़ालिम!
जिस तौर से चला ज़माना,
उस तौर से चलना सीखो!!
यूँ न आँखें मूँदें भागो,
ज़िन्दगी के इशारों पर!
दो पल आँखें खोलो यारों,
दो पल ठहरना सीखो!!
रख दो गिरवी रातों को,
याद करो उसकी बातों को!
जो जुर्म करो मोहब्बत का,
तो ये जुर्माना भरना सीखो!!
'कुशाग्र' ये दौर नहीं हैवानों का,
न दास्तानों के शैतानों का!
अब नफरतों पे पलने वाले,
इंसानों से डरना सीखो!!