सूरज के निकलने से पहले ही
खुल जाती है सुबह
जैसे, तुम जाग जाती हो
रोज़ाना
मेरे जगने के चंद मिनट पहले
किन्तु, आँखे खोले पड़ी रहती हो
कुछ देर बिस्तर पर ही
जैसे, चाँद पड़ा रहता है
सुबह के खुलने के बाद भी
काफी देर आसमान में ही
और
करता है सूरज के आने का इंतज़ार
सुबह के खुलते ही
शुरू होता है
इंसानी क़ौम का
अनवरत चलने वाला इंतज़ार
सुबह के खुलते ही
गुलाबों से भी गुलाबी तुम्हारे होंठ
और उनके ऊपर चस्पा स्याह तिल
उकसाते हैं
तुम्हें दोबारा रात जैसे
चूम लेने के लिए
सुबह के खुलते ही
प्रगाढ़ होने लगता है
~ हमारा प्रेम
सुबह के खुलते ही
पंछी घोंसलों से आ बाहर
लगते हैं चहचहाने;
हो जाते हैं दर-बदर
दाने की फ़िराक़ में,
बाज़ माँस की तलाश में
पहाड़ों से मैदानों का रुख़ करते हैं
और,
माएँ बड़ी तरतीब से रखती हैं
कण्डियां, लकड़ियाँ
चूल्हों पर
ताकि, जल सके चूल्हा
गर्म हो सके कलेवा
सुबह के खुलते ही
खुल जाती है भूख,एकाएक
सुबह के खुलते ही
मच्छर देते हैं आख़िरी चुम्बन
और चूस लेते हैं
ख़ून का वो क़तरा
जिसे वो अपना समझते हैं;
फिर चले जाते हैं
करने रात भर की नींद पूरी
किसी नाले, तलाब या भुसौरे में
जैसे, 'सरकार' चूस महसूल
करने लगते हैं विदेशी दौरे
मात्र सौ रुपये प्रतिमाह,
के दाम पर
अख़बार वाला पहुंचा जाता है अख़बार
दहशत, मातम, मायूसी
के हज़ारों नश्तर लिए
आता है अख़बार
सुबह के खुलते ही
आदमी होने लगता है
आदमी के सामने नँगा ।
नए मज़दूर से नहीं सम्हली
अंग्रेज़ी शराब
सड़क पर ही चैन से
सोता रहा रात-भर ;
अपार्टमेंट के चौकीदार ने
उसे बड़े अधिकार से जगाया
सुबह के खुलते ही
ज़्यादा नहीं, थोड़ा सा ही
खुल जाता है
~ हरेक आदमी
गली के कुत्ते भौंकने लगते हैं
पड़ोसी के लेब्राडॉर से
कई गुना भारी आवाज़ में
सुबह के खुलते ही
शुरू हो जाती है
खुद को औरों से
बेहतर साबित करने की कवायद
सुबह के खुलते ही
एक बार फिर
हमेशा के लिए
सच हो जाता है
डार्विन का सिद्धांत ।