मेरे अंदर एक पागलखाना है
तरह - तरह के पागल हैं
एक पागल हरदम बोलता ही रहता है,
दूसरा पागल ख़ामोशी ओढ़े है
बस नींद में कुछ बुदबुदाता है
एक पागल को छोड़ गई उसकी माशूक़ा
नज़्म लिखता है, ग़ज़ल गुनगुनाता है
पागल है, पागलों को सुनाता है
एक ख़ुशमिज़ाज पागल है
हंसता है, महफिलें जमाता है
कल पागलखाने में,
एक नया पागल दाखिल हुआ
वो भी बड़ा पागल है
क्रांति - क्रांति चिल्लाता है
सोने ही नहीं देता
मैंने बीती रात उससे पूछा,
"क्रांति आ गई तो क्या करोगे ?"
कहने लगा पागल
बाहों में भर के चूमेगा ....