मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरी शक्ल बनावटी के 'ब' से मिलती है
मैंने तबियत से फेंके हैं आसमान में पत्थर
और नहीं हुआ है कोई सुराख़
मेरा इश्क़ एक चोचला है
कभी नहीं किया उतना इश्क़
जितना मैंने लिखा है
ये आलिंगन, ये चुम्बन, ये आँसू, ये दर्द
सब फ़र्ज़ी हैं
मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरी उँगलियाँ बनावटी के 'न' से मिलती हैं
मेरी कविता लफ्फाजी है
मेरा गीत मामूली तुकबंदी है
भौंहों के गिरने-उठने से लेकर
आंखों के चौड़ा होने तक
मेरे सारे हाव-भाव नकली हैं
मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरे कूल्हे बनावटी के 'ट' से मिलते हैं
मैं जो तन के चलता हूँ
कई बार राह चलते औंधे मुँह गिरा हूँ
फिर खिसिया-सी सूरत लिए उठा हूँ
मैं एक बनावटी आदमी हूँ
मेरी शक्ल बनावटी के 'ब' से मिलती है