आधे रास्ते में ही छोड़ गया वह
जिसने मुझे चलना सिखाया था।
जब भी गिरा में कहीं पर..
दौड़ कर उसने मुझे उठाया था।
चुपचाप चुपके से, दबे पांव दुपके से
कई गलतियां की थी मैंने, मगर
मां की डांट से मुझे सदा बचाया था।
इच्छा प्रबल थी जिसे लेने की.
हिम्मत नहीं थी पापा से कहने की..
पहली कमाई से तुमने मुझे वो दिलाया था।
कभी लड़ाई कभी झगड़ा.
पर तुमने दिखाया हमेशा दिल बड़ा..
चीज थोड़ी थी मुझे खानी थी
अपना हिस्सा भी तुमने मुझे खिलाया था।
तुम बड़े थे सदा मेरे लिए खड़े थे.
खुद का नहीं मेरा जन्मदिन मने जिद्द पर अड़े थे.
सबसे ज्यादा खुशी से तुमने उसे मनाया था।
वर्ष बीत गए सात छूटे तुम्हारा साथ.
तुम बिन लगता जैसे कट गया मेरा एक हाथ..
तुमने किया बहुत कुछ मगर
कुश तुम्हारे लिए कुछ न कर पाया था।


