स्मृतियों के अवशेष


बस इतना जान पाया

विज्ञान के बारे में!

हमारी प्रिय वस्तुओं से हमें अलगाव कराती है।


टेलीफोन की घंटियों में

तुम्हारी धड़कन सुनाई देना।

अक्सर तुम्हारी राह देखते हुए,

घंटों तक टेलीफोन बूथ को ताकना।


अब तुम्हारी सारी स्मृतियाँ

मेरे बहुत समीप है

एक मोबाइल में बंद।

उन स्मृतियों में इंतज़ार और उतावलापन नहीं।


तुम्हारे जाने से कहीं अधिक

स्मृतियों के सिकुड़ जाने से

प्रेमी मारे जाएंगे।


स्मृति की यात्रा कितनी 

सुखद होती है 

तुम नहीं जानते?


तुम्हारी खिड़की से निकली

उदास हवा को 

रेगिस्तान तक पीछा कर 

संदूक में भरना।


तुम्हारी चिट्ठियों के 

इंतज़ार में, चौखट पर

सुबह से शाम हो जाना।


तुम्हारी केश सरीखे

काले बादल को

पश्चिम की पहाड़ियों से तोड़ना।


ये सभी स्मृतियाँ जीवंत हैं,

जीना चाहते है

हे ईश्वर!

मेरे सभी स्मृतियों को बना देना कविताएं,

जब-जब फड़फड़ाएंगे

कविताओं के पन्ने,

स्मृति के अवशेषों में दबे

प्रेमी जी उठेगा।


― कुन्दन चौधरी


Pic : Google