मैं इतने भय में रहा

जन्म और मृत्यु के बीच का शेष समय 

मैं "खुशी" तलाशते-तलाशते मर गया।


मैं बहुत दूर निकल आया था

"खुशी" ढूँढते-ढूँढते।

श्मशान के एक कोने में पड़ा था

मेरा पार्थिव शरीर।

लोगों की भीड़ में मेरी आत्मा ढूँढ़ रही थी

एक सुकून मौत वाली "खुशी"।

इस बात से अंजान कि

श्मशान के दूसरे कोने में

मुर्दा जलाने वाले के चेहरे पर

आमदनी आने की "खुशी" छलक रही थी।


मैं उम्र भर भटकता रहा खुशियां बटोरने के लिए।

जन्म लेने के पश्चात देख न सका

अपने चेहरे की पहली "खुशी" और

मरते समय मेरा चेहरा उदास था।


मैं इस संभावना में बार-बार जन्म लेता रहूँगा

कि मेरा जन्म मेरे ही कोख से हो!

किलकारियां लेते हुए अपने जन्म की "खुशी" देख पाऊँ।

मैं मुर्दा जलाने वाले कि तरह "खुश" होकर

अपने मृत शरीर को जलाना चाहता हूँ।


मैं "खुशी" पर कविता लिख चुका हूँ

भयमुक्त चेहरे जैसे दिखने वाले किसी शीर्षक की तलाश है।


― कुन्दन चौधरी


Pic Credit : Holly Herick