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ख़त


एक पैग़ाम लिए वहीं छिपा हूँ मैं, तुम्हारे एक तलब के लिए बेक़रार सा, उम्र ढल गया है,ख़ुद-परस्ती में जी रहा हूँ, मेरे सादे लिबासों में, मुझे खुद को दफ़न करना है, शिद्दत से पढ़ लेना इस बार , न जाने यही आखरी हो.. तुम्हारा, ख़त

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