दुनिया में भीड़ नहीं होती

तो हमारी मौत 

एक दूसरे को देखते हुए होता।


कितना आकर्षक था!

असंख्य लोगों की

मौजूदगी के बीच

सिर्फ़ तुम्हें देखना।तुम्हारे हँसी में 

छुपे संगीत को सुनना।

अनगिनत यातनाएं झेली

हमने एकांत के लिए।


हमें ज़बरन लाया गयायुद्ध के मैदानों में

रक्त में सने

आततायी भीड़ में।भीड़ जिसमें

मायावी शक्ति थी,

अवसाद से भरे थे लोग,

उनमें गर्जना थी,

उन्माद था उनमें 

ईश्वर को पूजने का।


स्मरण है मुझे

अंतिम दृश्य में तुम्हें 

ओझल होते देखा भीड़ में।तुम्हें रोकने की

मेरी आखरी पुकार

भीड़ की शोर में दब गई।

यूद्धभूमि में

हथियार न उठाने के 

कारण हम मारे गए।

भला होता,

अगर हम मिलते 

आसमाँ में

टूटते तारों की तरह

बेख़ौप और चुपचापहोती हमारी मौत।


हम निहत्थे प्रेमी थे

प्रेम के लिए

आबद्ध थे।

हमारे कर्म में 

भीड़ के हाथों परास्त होना लिखा था।


― कुन्दन चौधरी


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