आजाओ की बाहर बारात आई है, 

कुछ नाचते अंधों की जमात आई है। 

घोड़े पे बैठा गधा है एक बाहर, 

बैंड बाजे की टोली भी साथ आई है। 


सामान से किताबें निकाल फेक दो अब

के ससुराल में इनकी ज़रूरत नहीं 

हाथ में कलम की जगह अब चूला होगा 

बचपन तेरा अब यूँ ही धुनद्ला होगा 


माँ समझा रही है के डर मत, 

यही होता है, यही रीति रिवाज़ है। 

लड़की तो बस ज़िंदा है, 

उसके ना कोई सपने, ना आवाज़ है। 


कोई हाथ उठाए तो सह लेना तू, 

अपने ग़म ख़ुद से ही कह लेना तू, 

अंदर से रोकर भी मुस्कुराते रहना, 

मुश्किल है मगर ज़िन्दगी में खुश रह लेना तू। 

क्यूंकि ससुराल ने बहु नहीं नौकरानी ब्याही है, 

चल घूँघट ओड़ ले अब इसी में भलायी है। 


बाहर आजा की बारात आई है, 

कुछ नाचते अंधों की जमात आई है।


ये सवाल उबल रहा है मन में, 

के अभी तो 16 बरस की भी पूरी ना थी, 

क्यूँ झोंक दिया इस आग में ? 

क्यूँ बचपन का गला घोट दिया आपने ? 

अपनी ही बेटी संग क्यूँ किया ये बाप ने ? 

मगर, 

बाप की भी मजबूरी थी, समझो ज़रा, 

शादी बहुत ज़रूरी थी, समझो ज़रा। 

अरे उसपे बोझ था जो हटा दिया, 

बेटी थी सो ब्याह दिया। 


अब यही बतला दो उसे के विदाई कर अब हमें भूल जाना तू, 

अब ससुराल ही दुनिया है बेटी मुड़ कर ना आना तू। 

अपने सपनो को भी आज जला देना फेरों की इस आग में, 

जैसे बचपन को तेरे दुनिया ने आग लगाई है। 


आजाओ की बाहर बारात आई है। 


अरे संभाल लो के धुलन का लहंगा भारी है बहुत, 

धागों संग उसने, 

रिश्तों के बोझ की सिलाई है। 

आजाओ की बाहर बारात आई है,

कुछ नाचते अंधों की जमात आई है।

घोड़े पे बैठा गधा है एक बाहर,

बैंड बाजे की टोली भी साथ आई है।