फिर कोई उँगली थमाकर, दे सहारा मुस्कुराके।
छा गया नैराश्य अब, बनकर कुहासा हर दिशा में।
तृषित नयनों से निरन्तर,अश्रु धारा जब बही थी
यंत्रणा वृश्चिक डसन सी अन्तः मानस ने सही थी
जब तुम्हारे पास में अपनत्व जैसा कुछ नही था
तुम बहुत ही उल्लसित विलसित मुदित थीं
जब तुम्हे मेरी व्यथा का रंच भर अहसास न था
फिर मेरे प्रस्थान पर अब क्यों खड़ी हो फूल लेकर।।
मैंने रुदन के जग श्रवण को प्रथम कविता जब कही थी
जबकि सब थे पास मेरे किन्तु केवल तुम नहीं थीं।
जब हृदय पाषाण तेरा औ नयन थे शूल सम
जब मेरे हर यत्न पर तुम अकिंचन ही हँस रहीं थीं।
तब तुम्हें मेरे कथन पर कण सदृश विश्वास न था
अब क्या मिला मेरे दमन को तुम्हें अपनी भूल कहकर।।
#KUNAL


