प्रकृति का यह रूप तो देखो,
लगता हैं वसुधा मुरझा गई है।
धुंध की इन सफेद चादरों में,
पूरी धरती समा गई है।
पूछे अंबर,पूछे गगन
पूछे सारी नदियाँ।
पूछता हर नंदन वन,
क्यों रूठी हैं ये बगियाँ।
कहीं ये मानव जाति के कार्यों,
का दुष्परिणाम तो नहीं??
जो भोग रहे हैं सब,
जीव-जंतु और जल-जंगल
