पार्क में बैठा सोच रहा था,

घास पकड़ कर नोच रहा था।

याद उमड़ी मन में गाँव की,

भावनाओं को दबोच रहा था।।


रह-रह कर गाँव की यादें,

रह,रही थी हमें झकझोर।

सोच रहा था कहाँ,

चले आए हम अपने गाँव को छोड़।


कहाँ सवेरा हुआ करता था,

चिड़ियों की चहचहाट से।

आज आंखें खुलती है,

अलार्मों की गड़गड़ाहट से।।


यादें खींचती चलीं गई,

वो सावन की हरियाली में।

वो मक्के की खेत,

वो आमों की डाली में।


वो दादी का प्यार,

वो नानी का दूलार।

कहाँ मिलता हैं,

इस शहर में किसी को यार।


कहाँ मिलता है वो सुकून,

जो गाँव में था।

अपनी फुलवारी के,

नीम और पीपल की छांव में था।