काल की काली साया छा रही है,
हे परवरदिगार कुछ रौशनी तो दे!
राहों का हमसफर हूं,थक रहा हूं
जाते-जाते कहीं खो ना जाऊं।।
आंधियों के इरादे तो नेक नहीं लग रहे,
बगीचों से मंजर भी जा रहे हैं।
बिन मौसम बरसात हीं नहीं,ओले पड़ रहे हैं
अन्नदाता हीं नहीं,ग्रहणकर्ता भी टूट रहे हैं।।
काल कुछ यूं तांडव मचा रखी है,कि
वक्त-बेवक्त हीं मेहमानों को खींच ले जा रही।
दरिया भी डुबोने की आजमाइश तेज कर रखी है,
हूं आस में कहीं से तिनके का सहारा हीं मिल जाए।।
काल की काली साया छा रही है,
हे परवरदिगार कुछ रौशनी तो दे!
_Kunal Kumar


