तुम गंगाजल सी निर्मल हो, तुम ध्रुवतारे सी उज्ज्वल हो गीता का पावन ज्ञान हो तुम, तुम मृगनयनी हो चंचल हो तुम पर कविता कैसे लिख दूँ, तुम स्वयं गीत की माला हो जिस पर नत-मष्तक होता हूँ, तुम पावन वही शिवाला हो तुम गंगाजल सी........... तुम ध्रुवतारे सी............     मेरे जीवन के तपते पथ पर, अपनी जुल्फों का साया कर दो अपने एहसासों से छूकर, अब तृप्त मेरी काया कर दो मुझमे सुरूर भर जाने वाली, मादक एक मधुशाला हो जिस पर नत-मष्तक होता हूँ, तुम पावन वही शिवाला हो तुम गंगाजल सी........... तुम ध्रुवतारे सी............   प्रस्ताव मेरा ठुकरा दोगी, बस यही सोंच कर डरता हूँ लेकिन कह देता हूँ मंच से, मैं प्यार तुम्ही से करता हूँ मुझे सबक़ प्यार का देने वाली, कोई पाठशाला हो जिस पर नत-मष्तक होता हूँ, तुम पावन वही शिवाला हो तुम गंगाजल सी........... तुम ध्रुवतारे सी............