महफ़िल में नहीं तन्हाई में आती है, तेरी याद मुझे रुसवाई में आती है   तेरी संगत से मिलती है मुझे वही तस्कीन, जो तपती दोपहरी के दिन पुरवाई में आती है   तुम भी मोहन की वंशी में खोजो वही खुशबू, जो मुझे बिस्मिल्ला ख़ाँ की शहनाई में आती है