शे'र भी कह दिये, गीत भी रच दिये,
अब पढूँ इनको कैसे तुम्हारे बिना ।
धन-दौलत मिली सुख-वैभव मिला,
करूँ उपभोग कैसे तुम्हारे बिना ।।
तुम गयीं, ज़िन्दगी इस तरह से चली,
ज्यों बिना चाँद के रात ढलती रही ।
मैंने सोंचा तेरे संग चलूँ हर कदम,
तुम मुझे छोड़ आगे ही बढ़ती रहीं ।।
थम गया ये सफर, कुछ हुआ यूँ असर,
जैसे तिनका बहे एक सहारे बिना ।
शे'र भी कह दिये.............
है विरह वेदना को बचा के रखा,
ताकि सुधियों के संसार जीवित रहें ।
शांत एकांत माहौल मैंने चुना,
ताकि आँसू मेरे मुझमे सीमित रहें ।।
सुख पे आघात कर दिल को सौगात कर,
दर-बदर हो गया हूँ तुम्हारे बिना ।
शे'र भी कह दिये.......
मैं भटकता रहा वक़्त चलता रहा,
फिर मिलेंगें ये विश्वास पलता रहा ।
अनकही-अनसुनी सी ग़ज़ल तुम बनीं,
एक मुद्दत से मैं तुमको पढ़ता रहा ।।
प्यार की अस्मिता को बचा के रखा,
चाहें दुःख ही सहे हों तुम्हारे बिना ।
शे'र भी कह दिये.......