ज़ुल्फ़ बिखरी, आँख पे चश्मा, तबस्सुम लब पे- जंच रही होचाल चल कर नदी जैसी ढा रही हो कहर सब पे-जंच रही हो रूप का तसब्बुर तुम्हारे कोई बस इससे ही करलेहैं चाँदनी-ओ-रातरानी तक फ़िदा तुम पे-जंच रही होहाथ पर मेहँदी तुम्हारे इस क़दर चढ़ती है किमेहँदी ख़ुद कहती है तुमसे- जंच रही हो