Poetry 1 min read 212.6K reads

sayeri


किस कदर हमकों एक शख्स पराया सा लगाखुद का चेहरा भी फिर ग़वारा सा लगा

आरज़ू थी चाँद को भी तारो कीहमें खुद के घर मे भी अंधेरा सा लगा

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