इस झूठी झूठी दुनिया मैं सच का न कोई मोल सदा,
हर मोल बेमोल बिका होगा अपनों का न कोई मोल सदा !!,
हर पीर नीर का प्यासा है अपमानो की इस धारा पर ,
सागर भी नीर मांग रहा मेघो की अभिलाषा पर!! ......
कुंठित होता है जीवन झूठो के प्रपंचो से ,
मांग रही है ये बसुधा सत्यों को जंजीरो से !!,
सूर्य मंद अब हो उठा ,
चाँद चांदनी मांग रहा, घोर अघोर अन्धकार मै सत्य रौशनी मांग रहा!! ,...
अभिनन्दन होता हैं अधर्म का , यूं शीश झुकायें जाते हैं , अपनों के हाथो फिर से अपने ही काटे जाते है, हो सदा विजय ही धर्म सदा ,इक धर्म युद्ध हैं मांग रहा , मैं वीरो की इस भूमि से महायुद्ध हैं मांग रहा!!... कलयुग की अब इस धरा पर ,इक विजय युद्ध हैं मांग रहा , हो सदा धर्म की विजय सदा , केशव तुझको हूँ मांग रहा!!
