सुन मेरे हीरा कटती शाखाओं पर से नीड़ को छोड़ वह चिरैया बंद होते नल से टपकती बूंदों के साथ गुनगुनी धूप में अपने पंख फड़फड़ाती हैं--। तब उन्ही पेड़ों से बहुत सी चि‍डि़याऐं रस्सीयां खोलकर नीड़ों की तरफ़ लौटती हैं पंख फड़फड़ाने---।