मज़दूर जिम नहीं जाता है
फिर भी हमसे ज़्यादा वज़न उठाता है
खाके रूखी सूखी दाल रोटी
भरी धूप में काम पर जाता है
मज़दूर जिम नहीं जाता है
सर्दी,गर्मी,बरसात सब मौसम
उसके लिये होते एक समान हैं
धरती उसका बिस्तर है
चादर आसमान है
शरीर उसका फ़ौलाद है
पीठ पर उसकी औलाद है
फिर भी नहीं थकता है वो
कल की फ़िक्र से आज़ाद है
देखकर रईसों का रहन-सहन
वो अब भी हैरान है
जो कार से तो आता है
जिम में साइकिल चलाता है
मज़दूर जिम नहीं जाता है
फिर भी हमसे ज़्यादा वज़न उठाता है
वो कभी ओवरवेट नहीं होता
काम पर वो लेट नहीं होता
मोटा उसका पेट नहीं होता
उसका ज़्यादा रेट नहीं होता
मस्त है वो अपनी दिहाड़ी पर
दिन में रोटी रात में ताड़ी पर
सब मिलकर साथ में रहते हैं
कम पैसों में भी खुश रहते हैं
मज़दूर काजू बादाम नहीं चबाता है
फिर भी हम से ज़्यादा वज़न उठाता है
मज़दूर जिम नहीं जाता है
फिर भी हमसे ज़्यादा वज़न उठाता है
~कुमार ऋषि


