मैं सवाल बनके भटकता रहा
वो जवाब बनके खटकता रहा
छोड़ के गया है जो अभी अभी
बनके काँटा गले में अटकता रहा
हम तो हर हाल में राजी थे
गुमान उनका तलवार बनकर लटकता रहा
गोद में सर रख कर सुलाया जिसको
वही दिल हमारा जमीं पर पटकता रहा
चाँद की तलाश में निकला था आसमां
सारी रात तारों के बीच भटकता रहा
~कुमार ऋषि


