इन आँखों में कितने मंज़र रहते हैं
इन आँखों से कितने समन्दर बहते हैं
समझ सको तो समझ लो मेरे जज़्बात
मेरे आसमाँ और जमीं दोनों बंजर रहते हैं
~कुमार ऋषि


इन आँखों में कितने मंज़र रहते हैं
इन आँखों से कितने समन्दर बहते हैं
समझ सको तो समझ लो मेरे जज़्बात
मेरे आसमाँ और जमीं दोनों बंजर रहते हैं
~कुमार ऋषि