चल स्टेशन घूमने चलते हैं
कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ
हम किसी के क्या लगते हैं
करेंगे अपनी मनमानी
कभी इस प्लेटफार्म पर
तो कभी उस प्लेटफार्म पर बैठेंगे
पियेंगे गरम चाय
गरम समोसे खायेंगे
देखेंगे आती जाती ट्रेनों को
चढ़ते उतरते मुसाफ़िरों को
सुनेंगे कुली की आवाज़ों को
देखेंगे ट्रैक पर घूमते आवारा कुत्तों को
सुनेंगे रेलगाड़ी की सूचनाओं को
पढ़ेंगे लोगों के चेहरे उनकी भावनाओं को
दृश्य बड़े ही रोचक होते हैं स्टेशन के
ज़िन्दगी के हर हाल को दर्शाते हैं
जगह-जगह से यात्री यहाँ आते हैं
हम भी तो यात्री ही हैं इस दुनिया में
बस इसकी ट्रेन कभी लेट नहीं होती
एक दम समय पर है आती
रेलवे जैसी उदघोषणा नहीं करती मग़र
काश करती तो
कुछ ज़रूरी काम निपटा जाते
जो हमारे जाने के बाद छूट जाते हैं
चल स्टेशन घूमने चलते हैं
कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ
हम किसी के क्या लगते हैं
~कुमार ऋषि


