'स्त्री एवं हमारा समाज'


हम उस समाज में जी रहे हैं जहां स्त्रियों को कभी आगे नहीं बढ़ने देती है। अगर वो आगे बढ़ना चाहे तो उनके पैरों में जंजीर बांध दी जाती है। फिर भी वो यदि यह जंजीर तोड़कर आगे बढ़ती हैं तो यह समाज उसे अनेकों प्रकार से रोकना चाहती है।


जी हां, मैं उसी समाज की बात कर रहा हूं जो स्त्रियों को अनेक प्रकार के प्रथाओं में धकेल देती है।

जी हां, प्रथा, यह वही प्रथा है जो कभी स्त्रियों को उसके पति के मृत्यु के बाद उसकी जलती चिता में इसे भी जिंदा जलाया जाता था और ये समाज उसे ' सती प्रथा ' कहती थी।


देवदासी प्रथा , दहेज प्रथा आदि- आदि कितनी प्रथा और कुरीतियां हमारे समाज में पाई जाती थी और हैं भी।

हैं भी का मतलब दहेज प्रथा, दहेज प्रथा अभी भी चल रही है। दहेज लेने और देने का काम अभी भी चल ही रहा है। दहेज लेना और देना दोनों कानूनी अपराध है, फिर भी यह समाज है समझेगी थोड़े ही।

इसी दहेज के खातिर सासुरालों में बहुओ को जलाया है। गलत - सही सभी समझते हैं लेकिन ये समाज है सुधरने वाले तो हैं नहीं।


और जब बलात्कार जैसी घोर अपराध इस समाज में होती है तब तो इस समाज के मुंह पर कालिख की तरह होती है। यह समाज इस पर ना तो मुंह छुपा सकती है और ना ही दिखा सकती है।

हमारे समाज के लिए कितनी शर्म की बात है कि पहले बलात्कार, हत्या और फिर जलाया जाता है।

शर्म क्या आयेगी इस समाज को स्त्रियों को जलाने में क्योंकि इस समाज ने तो सिर्फ जलाया ही तो है।


यह समाज ढोंगी भी बहुत है क्योंकि उसी स्त्री रूपी देवी की पूजा भी करती है और नवरात्र के समाप्ति पर , उसी कन्याओं को भोजन करा कर चरण स्पर्श कर आशीर्वाद भी लेती है।


अंत में, मैं यही कहना चाहूंगा कि हम और हमारा समाज यह क्यों भुल जाते हैं कि हम और हमारा समाज उसी स्त्री से बने है।

~Prince Kumar


                 धन्यवाद आपका !