एक लड़की थी दीवानी सी, चाय की!

एक लड़के पे वो मरती थी,


एक लड़का था दीवाना सा, चाय का!

उस लड़की पे वो मारता था।


जब भी मिलता उनसे,

पूछता, चाय पीने चलोगी।

मुस्कुरा के, बलखा के वो

हा में नजरें उठाती थी।


अब शुरू हो गई उनकी ये हसीन कहानी थी,

हर शाम उनके संग चाय पे जो बितानी थी।



अब बीत गए वो कॉलेज के दिन,

वो कैंटीन के पल गए अब उनसे छीन।

ना जाने कब आएंगे वो पल,

दिन रात यही सपना वो बुनता है।

अपने चाय के कुल्हड़ के साथ,

उनकी चुस्की सुनता है।