माँ...'s image
गाँव के साहब के बेटे जैसा मुझे कपड़ा तुम ला दो न मैं भी दिखूं उसी के जैसा कुछ ऐसा पहना दो न संग खेल रहे थे हमदोनों एक ही पेड़ की डाली पर थी निगाहें हमदोनों की डूबते सूरज की लाली पर उड़ रहे थे हमदोनों परिंदे संग आसमानों में थी आती एक ही संग कोयल की बोली कानों में थे मशगूल संग हमदोनों झूठी किसी कहानी में थे देख रहेे संग हमदोनों परछाई अपनी पानी में थी खुशी अपने चरम पर दूर जो कंकड़ फेका था सच कहता हूँ मेरी माँ ऐसा पल कभी न देखा था वो गाँव के साहब है न मुझे बहुत मारा है कह रहा था देख इसे मेरा बेटा कितना प्यारा है मेरे राजकुमार के सामने औकात नहीं है कुछ जिसका वो खेलता है संग इसके ऐसा कुछ कहना था उनका एक मुझे भी उसके जैसा कोई कपड़ा सिलवा दो न राजकु
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