गाँव के साहब के बेटे जैसा
मुझे कपड़ा तुम ला दो न
मैं भी दिखूं उसी के जैसा
कुछ ऐसा पहना दो न
संग खेल रहे थे हमदोनों
एक ही पेड़ की डाली पर
थी निगाहें हमदोनों की
डूबते सूरज की लाली पर
उड़ रहे थे हमदोनों
परिंदे संग आसमानों में
थी आती एक ही संग
कोयल की बोली कानों में
थे मशगूल संग हमदोनों
झूठी किसी कहानी में
थे देख रहेे संग हमदोनों
परछाई अपनी पानी में
थी खुशी अपने चरम पर
दूर जो कंकड़ फेका था
सच कहता हूँ मेरी माँ
ऐसा पल कभी न देखा था
वो गाँव के साहब है न
मुझे बहुत मारा है
कह रहा था देख इसे
मेरा बेटा कितना प्यारा है
मेरे राजकुमार के सामने
औकात नहीं है कुछ जिसका
वो खेलता है संग इसके
ऐसा कुछ कहना था उनका
एक मुझे भी उसके जैसा
कोई कपड़ा सिलवा दो न
राजकुमार मैं भी बन जाऊँ
कुछ ऐसा पहना दो न
पापा को तो होंगे पैसे
कहो हमारे संग चले
खरीदेंगे कोई ऐसा कपड़ा
देख साहब की आँख जले
सुनकर सारी बातों को माँ
आँखों में नमी छुपाती है
देख बेटे के इस जिद्द को
सीने से लगाती है
गिरती है इतनी इंसानियत
माँ भी न समझ पाई थी
एक कपड़े की कमी ने माँ के
आँखों में लहू लाई थी
चाहकर भी माँ ने जब
कपड़ा न उसे दिला पाई
होती है क्या सच में गरीबी
माँ को तभी समझ आई
देखकर जिद्द बेटे का
माँ अंदर तक जाती है
फाड़कर अपनी आँचल को
दौड़ी चली आती है
बिठा अपनी गोद में फिर
राजकुमार उसे बनाती है
एक माँ के प्यार से देखो
सारी खुशियाँ मिल जाती है
है माँ ममता की सागर
जिसमें दुख कोई आधार नहीं
खुश है माँ तो सफल हो तुम
वरना जीवन का कोई सार नहीं