वह भटकती सड़क पर कुछ इस तरहकि दिख जाए कोई शख्स इधर-उधरथामे खिलौने, बर्तन और ढेरों सामानकि मिल जाए कोई खरीदार खरीदने के लिए ।निहारती झांकती टकटकी आंखों से वहदिखता हर शख्स उसे मालिक जैसाजो दे दे उसे भूख की दवाकि मिट जाए भूख सदा के लिए ।धूप,बारिश,तूफान सब कुछउसे निट्ठल्ला सा लगता हैउसे सिर्फ रोटी चाहिएइंसान हैं उसे भी पेट में हल्ला सा लगता है।महल,घर,बसेरा सब उसेनावाकिफ लगता हैटूटी,छोटी,झांकती झोपड़ी भीउसे आशियाना लगता है।किस्मत कुछ इस कदर रूठी हैहर रोज उसे गरीब सा लगता हैसोचती है मिल जाएगा अभी वहजो हर रोज खुदा -सा लगता है ।