ओ भारत के लोगों ! क्यों बैठे हो धरे हाँथ तुम्हारा गर्जन सुनने के लिए बाट जोह रहा है नाथ (राष्ट्र) । कर प्रयोग अपनी युद्ध भरी आवाज बरछी,भाला, खडग, बारूद की तरह पंक्तिबद्ध हो जाओ तुम सब स्वयं में मिटा दो वजूद अमानवीय स्थितियों का। छोड़ दो सारे षड्यंत्री राजनीतिक गिरोहों का साथ सब टट्टुओं,गद्दारों,बेईमानो का समूह है यह डूबा हुआ है यह वृहद लोलुपता में खेलता है खेल हर जगह फिरकापरस्ती। मिलाओ कंधे से कंधा संघर्ष पथ पर मिटा दो स्वेच्छाचारियों को धूल की परत पर उठाओ अर्जुनों गांडीव युद्ध स्थल पर क्रान्तिदर्शियों विराजो इंकलाब के रथ पर।


