बहुत दिन हो गए है सुकुन की नींद सोए
अब घर जाने का मन करता है ,
बहुत दिन हो गए है खुद से बिछड़े
कि घर जाने का मन करता है ,
शहर के शोर सराबे ने जिगर जला दिया
कान कोयल की मीठी आवाज चाहता है
कि घर जाने का मन करता है ,
जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे जा रहे है
सुकुन पापा के ही सायें में मिलता है
कि घर जाने का मन करता है ,
गलतियां करने पर जो संभाल सके
जिंदगी भईया के उसी हाथ को मांगता है
कि घर जाने का मन करता है ,
खुल के हँस सके वो हर शाम
दोस्तों की महफिल वाली रात को मचलता है
कि घर जाने का मन करता है ,
बहुत हो गई तारों से बात कि दिल
दीदी को सदा याद करता है
कि घर जाने का मन करता है ,
मोबाइल पे Video Call चाहे जितना कर लो
पर वो बिछड़न की टीस यहां सदा रहता है
कि घर जाने का मन करता है ,
सजा लूं ये चार दीवारी चाहे जितना भी
मगर Perfect सिर्फ मम्मी - पापा
का आशियां लगता है
कि घर जाने का मन करता है ,
स्कूटी पे किसी बच्चे की खुशी देख
पापा की वो साईकिल याद आता है ,
हाथों में Ice cream देख Frooty का वो
पैकेट याद आता है ,
वो हर रात चिपक के सोना मुझे याद आता है ,
प्यार से पांव दबाना मुझे याद आता है ,
बड़े होने की अंधी जिद्ध में अब बचपना
याद आता है ,
भूख भी नहीं मिटती हर रोज
और जी वो स्वाद को तरसता है
मन मां के हाथों के प्यार को तरसता है
कि घर जाने का मन करता है ,
अब घर जाने का मन करता है ।

