आज जनता कर्फ्यू के दौरान अकेले में घर बैठ वर्तमान त्रासदी की प्रासंगिकता पर मैंने एक कविता लिखी हैं।अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।
हे मानव!!
मत खेल प्रकृति से
मत समझ उसे खिलौना
जब-जब तू प्रकृति से खेला हैं
हर बार तूने उसका कहर झेला हैं
कभी तूफान,भूकम्प,सुनामी का रोना
तो अब वैश्विक महामारी कोविड कोरोना
जिसका दंश झेल रहा हैं आज सारा जमाना।।
हे मानव!!
मत खेल प्रकृति से
मत समझ उसे खिलौना
पढ़-लिख तूने ऐसा ज्ञान क्यों पाया
कि अपने ही विनाश का जाल बिछाया
कभी खेलता हथियारों को बना खिलौना
सिमट रही मानवता मुश्किल हो रहा जीना
संभल ज़रा नही तो पड़ेगा महाविनाश भुगतना।।
हे मानव!!
मत खेल प्रकृति से
मत समझ उसे खिलौना।।
#धर्मेन्द्र_कुमार_धर्मी
दौसा, राजस्थान


