इस जीवन का सार समझ लो

रिश्तों में तुम प्यार समझ लो


यदि समझना इस दुनिया को

निश्छल तुम घर बार समझ लो


तलवारें हारी कलमों से

ताकतवर हथियार समझ लो


प्रकृति भेद नहीं करती है

घर सारा संसार समझ लो


जाति धरम मज़हब में टूटे

होना बंटाधार समझ लो


इंसाँ बने रहना काफ़ी है

रब से ये इकरार समझ लो


मर जाते हैं लोग कमाकर

रीत यही है यार समझ लो

© अनिल कुमार निश्छल