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मुक्तक - श्रृंगार


" नदी बनकर चली आओ समंदर राह तकता है;हमें अपना बना जाओ समंदर राह तकता है।

मिलन की बात है लेकिन नदी फिर कब नदी रहती;चली आओ समा जाओ समंदर राह तकता है ।"

— अनिल कुमार निश्छल
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