पाँव जलने लगें जब भरी धूप में
छाँव बनकर हमेशा चले आइए

उलझनें ज़िंदगी और देने लगे
गाँव बनकर हमेशा चले आइए

प्रेम का हर शिखर जब हो चढ़ना हमें
भाव बनकर हमेशा चले आइए

स्वाद जब ज़िंदगी का कसैला लगे
चाव बनकर हमेशा चले आइए

अनिल कुमार ''निश्छल''

शिवनी, हमीरपुर