तु आई एक बहार बनके, मेरा पतझड़ मुझसे ले गयी। तु आई मेरी शायरी बनके, फिर से मुझे अल्फ़ाज़ दे गयी।   टूट गया था मैं;बिखर गया था, खोकर खुद में ही;सिहर गया था। रोने लगा था छुप छुपकर, मगर अब हसने लगा हूँ। भूल गया था मैं सारे गीत, पर अब झुमके गाने लगा हूँ।   इक बात बता;क्यूँ इतना इंतजार कराया? क्यूँ इस बेताब दिल को तड़पाया? क्यूँ?क्यूँ?...... बहारे पहले भी आ सकती थी, बदली दुख की पहले भी हट सकती थी, पर शायद पहले आ जाती तो! ये आलम ना बना होता, एक सीधा साधा लड़का।।। यूँ शायर ना बना होता।   ख़ुशियों से ड़र लगता था, कहीं कोई फिर ना चुरा ले। दो पल हसाकर इस शायर को, कहीं कोई फिर ना रुला दे।   अब मन करता है;झूम जाऊँ~ झूम जाऊं तुझे आगोश में लेकर, देखता रहुं तेरी मासूमियत को, तेरे रूप को..तेरी जुल्फे खोलकर।   इस दीवाने को अब मत टूटने देना, रूठना भी चाहे तो रुठने मत देना। जाना चाहे जो तुझसे दूर तो बांहो मे लेके, आंखो में फसाकर निकलने मत देना।   भुलवा दे उन सारे दुखो को;वो पतझड़ के मौसम;वो दर्द के बादल। ले-ले अपने साथ और फिर चल, ले जा दूर इन सब से;जहां सिर्फ.. तुम हो;मैं हूँ;और हमारी खुशियाँ। और हमारी खुशियाँ।