मची हो जीवन में तूफान अगर
चहुँ ओर हो अंधकार अगर
तब ध्यान को तुम साध लेना
उड़नी हो ऊँची उड़ान अगर

धधक उठी हो ज्वाला कहीं
धूप हो या, हो छाँव कहीं
मन में इक बीज जब फूट पडा़
तब क्या आग कहीं, पानी कहीं

जो चल पड़े कदम तो चल पड़े
जब लक्ष्य की ओर बढ़ पड़े
तब गतिरोधों से घबराना क्या
उडा़नों की ओर जब निकल पड़े

रूख हवाओं का भी मुड़ जाएगा
उगता सूरज भी ढल जाएगा
अटल रहना तू, अपने पथ पर
वक्त का क्या हैं, ये भी बदल जाएगा...

- कुमार उन्नयन