शमां की रोशनी बुझ गई, फिर से कहीं वो शाम मिल जाए
भटकता हूँ लिए दर्द मैं, कोई तो इसका खरीदार मिल जाए
बेमोल बिक जाए, फिर भी कोई गम नहीं
मेरे मौला कहीं तो, वो बाज़ार मिल जाए
रौशन होते हैं मयखाने, हर शाम इस उम्मीद में
क्या पता गम बाँटने को, वहाँ कोई अनजान मिल जाए
भटका हूँ इन फिजाओं में, परिन्दों की तरह
मिला न कोई आशियाँ, जहाँ दिल को आराम मिल जाए...
-उन्नयन कुमार
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