जब मैंने घर छोड़ा,
तो दरवाज़ा पीछे नहीं बंद हुआ
वह भीतर कहीं खुल गया।
रास्ते मेरे पैरों के नीचे नहीं थे,
वे मेरी आँखों में फैलते थे,
हर मोड़ पर
एक नया अर्थ लिखते हुए।
खिड़की के पार भागते खेत
मेरी उम्र से बड़े थे,
उन्होंने मुझे सिखाया
कि समय भी
बीज की तरह उगता है।
शहरों ने
मुझे नामों से नहीं पुकारा,
उन्होंने मुझे
आदतों से पहचाना।
और इन्हीं रास्तों के बीच
कुमार उन्नयन
खुद को पढ़ता चला
डर की पंक्तियाँ मिटती गईं,
हौसले नए अक्षर बनते गए।
