पग-पग ज्वाला, पग-पग रफ्तार तू कदमों में अपने अंगार भर लेले दुनियाँ को जद़ में अपने तू ऐसी इक हुँकार भर तू धीर धर, तू ईमान रख जज्बों में अपने इक तूफान रख उठ बढा चल अपनी चाल में हौसलों में अपने इक परवान रख तू कदम-कदम बढ़ाए जा सैलाबों से टकराए जा चट्टान तू, फिर हैरान क्यों? तू अपनी अलख जगाए जा जो तेज है, तलवार बन जलती हुई मशाल बन तू इश्वर नहीं, मौला नहीं पर जिंदा इक मिसाल बन जो जिंदा है, इंसान बन फौलाद है तो सबकी ढ़ाल बन ह्दय की गति रूक जाने का क्या गम धड़कनों में धकड़, तू सबकी जान बन - कुमार उन्नयन
