वक़्त की इस दौड़ में ख्वाहिशों का हाथ थामा न होता,
काश हमने अपने अरमानों के पंखो को काटा न होता
रूठ गयी शायद सपनो की मंज़िले सारी,
काश हमें ज़माने के दिखाए रास्ते पर जाना न होता
गिले शिकवे, सुख दुःख की आंख मिचोली के बीच,
काश हर मक़ाम पर कामयाबी पाने का बहाना न होता,
कल्पना के स्लेट पे बनाये थे जो हवाई किले,
काश हक़ीक़त की इस दुनिया में उन्हें मिटाना न होता
जीत हार होती थी हर खेल का हिस्सा, एक साथ बैठ कर सुनना दादी नानी का किस्सा
ज़िन्दगी के किस्से में हार का अफ़सोस जताना न होता
ज़िन्दगी के हर लम्हे को क़र्ज़ के किश्तों में बांटा न होता,
काश हमने अपने अरमानों के पंखों को काटा न होता।